Tuesday, 31 December 2024

कक्षा नियंत्रण के लिए अनुशासन और नियम

 1. समय पर उपस्थिति


सभी छात्रों को समय पर कक्षा में उपस्थित होना आवश्यक है।


देर से आने पर शिक्षक से अनुमति लेनी होगी।



2. चुप्पी बनाए रखना


कक्षा में बिना अनुमति के बात न करें।


शिक्षक के निर्देश का पालन करते समय पूरी तन्मयता से सुनें।



3. सामग्री तैयार रखें


छात्रों को सभी ज़रूरी सामग्री (किताबें, कॉपी, पेन आदि) साथ लानी चाहिए।


बार-बार सामग्री लेने के लिए कक्षा से बाहर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।



4. शिष्टाचार और आदर


शिक्षक और सहपाठियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करें।


किसी प्रकार के अपशब्दों या असभ्य व्यवहार की अनुमति नहीं है।



5. हाथ उठाकर अनुमति लें


सवाल पूछने या जवाब देने के लिए पहले हाथ उठाएँ और अनुमति लें।



6. स्थान पर बैठे रहें


अपनी जगह पर शांति से बैठें जब तक कि अन्यथा अनुमति न दी जाए।


अनावश्यक रूप से उठना या घूमना प्रतिबंधित है।



7. मोबाइल और गैजेट्स का उपयोग


कक्षा के दौरान मोबाइल फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का उपयोग सख्त वर्जित है।


जरूरत पड़ने पर शिक्षक की अनुमति लें।



8. होमवर्क और असाइनमेंट समय पर जमा करें


सभी कार्य समय पर पूरा करें और जमा करें।


देरी होने पर शिक्षक को पूर्व में सूचित करें।



9. साफ-सफाई बनाए रखें


कक्षा को साफ और व्यवस्थित रखें।


कूड़ा हमेशा कूड़ेदान में डालें।



10. ध्यान से सुनें और सहयोग करें


कक्षा के नियमों और शिक्षक के निर्देशों का पालन करें।


टीम वर्क और समूह कार्यों में सक्रिय योगदान दें।



11. पुरस्कार और सज़ा की व्यवस्था


अनुशासन का पालन करने वाले छात्रों को सराहना या पुरस्कार दिया जाएगा।


नियम तोड़ने वालों को चेतावनी या उचित सज़ा दी जाएगी।

भ्रष्टाचार पर कव्वाली

।।।।।।।।।।-# भ्रष्टाचार पर कव्वाली#-।।।।।।।।।।

दीपावली के शुभ अवसर पर पापा अपने परिवार को दीपावली गिफ्ट आइटम हेतु कव्वाली के माध्यम से संदेश भेजते हैं।

पापा ने अपनी बेटी को फोन घुमाया । 2।और कहा बेटी में देखना चाहता हूं, तुम्हारा मुस्कुराना आज गिफ्ट में क्या लाना है जरा मुझको बताना।

बेटी समझदार थी बेटी ने क्या कहा जरा ध्यान से सुनना।

पापा बेशक बदल गया है जमाना ,पापा बेशक बदल गया है जमाना ।भले ही मेरे लिए महंगा गिफ्ट आइटम मत लाना ।पर सारी दुनिया के पापाओ को यह बतलाना हम बेटियां भी चाहते हैं खिलखिलाना ।कभी कोई पापा अपनी बिटिया को गर्भ में ना मिटाना।

इसके पश्चात पापा ने अपने बेटे को फोन लगाया ,और कहा।

पापा ने अपने बेटे को फोन घुमाया ,पापा ने अपने बेटे को फोन घूम आया ,और कहा ।बेटा आप भी बता दो दीपावली के गिफ्ट आइटम मे क्या है लाना।

तो बेटा ने क्या सुंदर जवाब दिया, जरा ध्यान से समझना।

पापा मेरे लिए गिफ्ट आइटम ना लाना । पर सारी दुनिया के पापाओ को यह समझाना कि आप जिस गद्दी पर बैठे हो उसकी लाज निभाना। कहीं भ्रष्टाचार की लिस्ट में अपना नाम न लिखवाना शायद मेरे लिए गिफ्ट आइटम ना लाना।

इसके पश्चात पापा अपने बूढ़े मां-बाप को फोन लगाकर गिफ्ट आइटम का ग्रह कहते हैं ।तब बूढ़े मां-बाप क्या जवाब देते हैं ,

पापा नेअपनी बूढ़ी मां को फोन घुमाया ।।पापा ने अपनी बूढ़ी मां को फोन घुमाया और कहा मां बाबा से पूछ कर बताना ।,दीपावली का गिफ्ट आइटम क्या है लाना।

तब बूढ़ी मां ने क्या जवाब दिया जरा ध्यान से समझना।

बूढ़ी मां ने कहा बेटा हमारे लिए गिफ्ट आइटम ना लाना ।बेटा हमारे लिए गिफ्ट आइटम ना लाना ।पर सारे पापा ओं को यह समझाना कि जब तक बुढी मांं और दादा जिंदे है कभी आंगन में दीवार ना बनाना। बेझिझक गिफ्ट आइटम ना लाना।

इस प्रकार एक कव्वाली के माध्यम से भ्रष्टाचार कोसमझाया गया है।

Tuesday, 19 November 2024

संत रामपाल जी महाराज

रामपाल जी महाराज एक आध्यात्मिक संत और गुरू हैं, जो सतलोक आश्रम के संस्थापक हैं। उनका उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान का प्रसार और समाज में एकता, भाईचारा, और सदाचार को प्रोत्साहन देना है। रामपाल जी महाराज संत कबीर साहेब के अनुयायी हैं और उनकी शिक्षाओं के आधार पर अपने प्रवचन देते हैं।

उनके कार्य और शिक्षाएं:

1. सतग्रंथों पर आधारित ज्ञान:
रामपाल जी महाराज वेद, गीता, पुराण, बाइबिल, कुरान और गुरु ग्रंथ साहिब जैसे धार्मिक ग्रंथों को अपने प्रवचनों का आधार बनाते हैं। वे कहते हैं कि इन ग्रंथों में दिए गए सत्य को समझकर ही मोक्ष की प्राप्ति संभव है।


2. भक्ति और सदाचार का प्रचार:
उनकी शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य भक्ति के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से जोड़ना है। वे पवित्र जीवन और सही मार्गदर्शन के महत्व पर जोर देते हैं।


3. सामाजिक सुधार:
रामपाल जी समाज से नशाखोरी, दहेज प्रथा, जातिवाद, और अंधविश्वास जैसी कुरीतियों को मिटाने के लिए प्रयासरत हैं। उनके अनुयायी सरल और नैतिक जीवन जीने का अभ्यास करते हैं।


4. सत्संग और आश्रम संचालन:
सतलोक आश्रम, जिसे वे संचालित करते हैं, उनके प्रवचनों और सामाजिक कार्यों का केंद्र है। यहाँ नियमित रूप से सत्संग, धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या और आध्यात्मिक साधना की शिक्षा दी जाती है।



उनकी शिक्षाओं का मुख्य उद्देश्य:

रामपाल जी महाराज के अनुसार, सभी धर्मों का वास्तविक उद्देश्य ईश्वर की प्राप्ति है, और यह केवल सत्य ज्ञान तथा भक्ति से ही संभव है। उनके अनुयायी उनके दिखाए मार्ग पर चलकर आत्मिक शांति और मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर होते हैं।

यदि आप रामपाल जी महाराज द्वारा संचालित किसी विशेष पहल, आश्रम, या उनके संदेशों के बारे में और जानकारी चाहते हैं, तो कृपया अधिक स्पष्ट करें।

Sunday, 1 January 2023

युगो की गिनती करना

*इसे  सेव कर सुरक्षित कर लेवे। वाट्सअप पर ऐसी पोस्ट  कम ही आती है।*
विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियो पर किया अनिल अनुसंधान )

■ काष्ठा = सैकन्ड का  34000 वाँ भाग
■ 1 त्रुटि  = सैकन्ड का 300 वाँ भाग
■ 2 त्रुटि  = 1 लव ,
■ 1 लव = 1 क्षण
■ 30 क्षण = 1 विपल ,
■ 60 विपल = 1 पल
■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) ,
■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा )
■ 24 होरा = 1 दिवस (दिन या वार) ,
■ 7 दिवस = 1 सप्ताह
■ 4 सप्ताह = 1 माह ,
■ 2 माह = 1 ऋतू
■ 6 ऋतू = 1 वर्ष ,
■ 100 वर्ष = 1 शताब्दी
■ 10 शताब्दी = 1 सहस्राब्दी ,
■ 432 सहस्राब्दी = 1 युग
■ 2 युग = 1 द्वापर युग ,
■ 3 युग = 1 त्रैता युग ,
■ 4 युग = सतयुग
■ सतयुग + त्रेतायुग + द्वापरयुग + कलियुग = 1 महायुग
■ 72 महायुग = मनवन्तर ,
■ 1000 महायुग = 1 कल्प
■ 1 नित्य प्रलय = 1 महायुग (धरती पर जीवन अन्त और फिर आरम्भ )
■ 1 नैमितिका प्रलय = 1 कल्प ।(देवों का अन्त और जन्म )
■ महालय  = 730 कल्प ।(ब्राह्मा का अन्त और जन्म )

सम्पूर्ण विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र यही है। जो हमारे देश भारत में बना। ये हमारा भारत जिस पर हमको गर्व है l
दो लिंग : नर और नारी ।
दो पक्ष : शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष।
दो पूजा : वैदिकी और तांत्रिकी (पुराणोक्त)।
दो अयन : उत्तरायन और दक्षिणायन।

तीन देव : ब्रह्मा, विष्णु, शंकर।
तीन देवियाँ : महा सरस्वती, महा लक्ष्मी, महा गौरी।
तीन लोक : पृथ्वी, आकाश, पाताल।
तीन गुण : सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण।
तीन स्थिति : ठोस, द्रव, वायु।
तीन स्तर : प्रारंभ, मध्य, अंत।
तीन पड़ाव : बचपन, जवानी, बुढ़ापा।
तीन रचनाएँ : देव, दानव, मानव।
तीन अवस्था : जागृत, मृत, बेहोशी।
तीन काल : भूत, भविष्य, वर्तमान।
तीन नाड़ी : इडा, पिंगला, सुषुम्ना।
तीन संध्या : प्रात:, मध्याह्न, सायं।
तीन शक्ति : इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति, क्रियाशक्ति।

चार धाम : बद्रीनाथ, जगन्नाथ पुरी, रामेश्वरम्, द्वारका।
चार मुनि : सनत, सनातन, सनंद, सनत कुमार।
चार वर्ण : ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र।
चार निति : साम, दाम, दंड, भेद।
चार वेद : सामवेद, ॠग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद।
चार स्त्री : माता, पत्नी, बहन, पुत्री।
चार युग : सतयुग, त्रेतायुग, द्वापर युग, कलयुग।
चार समय : सुबह, शाम, दिन, रात।
चार अप्सरा : उर्वशी, रंभा, मेनका, तिलोत्तमा।
चार गुरु : माता, पिता, शिक्षक, आध्यात्मिक गुरु।
चार प्राणी : जलचर, थलचर, नभचर, उभयचर।
चार जीव : अण्डज, पिंडज, स्वेदज, उद्भिज।
चार वाणी : ओम्कार्, अकार्, उकार, मकार्।
चार आश्रम : ब्रह्मचर्य, ग्राहस्थ, वानप्रस्थ, सन्यास।
चार भोज्य : खाद्य, पेय, लेह्य, चोष्य।
चार पुरुषार्थ : धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष।
चार वाद्य : तत्, सुषिर, अवनद्व, घन।

पाँच तत्व : पृथ्वी, आकाश, अग्नि, जल, वायु।
पाँच देवता : गणेश, दुर्गा, विष्णु, शंकर, सुर्य।
पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा।
पाँच कर्म : रस, रुप, गंध, स्पर्श, ध्वनि।
पाँच  उंगलियां : अँगूठा, तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठा।
पाँच पूजा उपचार : गंध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य।
पाँच अमृत : दूध, दही, घी, शहद, शक्कर।
पाँच प्रेत : भूत, पिशाच, वैताल, कुष्मांड, ब्रह्मराक्षस।
पाँच स्वाद : मीठा, चर्खा, खट्टा, खारा, कड़वा।
पाँच वायु : प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान।
पाँच इन्द्रियाँ : आँख, नाक, कान, जीभ, त्वचा, मन।
पाँच वटवृक्ष : सिद्धवट (उज्जैन), अक्षयवट (Prayagraj), बोधिवट (बोधगया), वंशीवट (वृंदावन), साक्षीवट (गया)।
पाँच पत्ते : आम, पीपल, बरगद, गुलर, अशोक।
पाँच कन्या : अहिल्या, तारा, मंदोदरी, कुंती, द्रौपदी।

छ: ॠतु : शीत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, बसंत, शिशिर।
छ: ज्ञान के अंग : शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष।
छ: कर्म : देवपूजा, गुरु उपासना, स्वाध्याय, संयम, तप, दान।
छ: दोष : काम, क्रोध, मद (घमंड), लोभ (लालच),  मोह, आलस्य।

सात छंद : गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप, जगती।
सात स्वर : सा, रे, ग, म, प, ध, नि।
सात सुर : षडज्, ॠषभ्, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत, निषाद।
सात चक्र : सहस्त्रार, आज्ञा, विशुद्ध, अनाहत, मणिपुर, स्वाधिष्ठान, मुलाधार।
सात वार : रवि, सोम, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि।
सात मिट्टी : गौशाला, घुड़साल, हाथीसाल, राजद्वार, बाम्बी की मिट्टी, नदी संगम, तालाब।
सात महाद्वीप : जम्बुद्वीप (एशिया), प्लक्षद्वीप, शाल्मलीद्वीप, कुशद्वीप, क्रौंचद्वीप, शाकद्वीप, पुष्करद्वीप।
सात ॠषि : वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भारद्वाज, अत्रि, वामदेव, शौनक।
सात ॠषि : वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र, भारद्वाज।
सात धातु (शारीरिक) : रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, वीर्य।
सात रंग : बैंगनी, जामुनी, नीला, हरा, पीला, नारंगी, लाल।
सात पाताल : अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल।
सात पुरी : मथुरा, हरिद्वार, काशी, अयोध्या, उज्जैन, द्वारका, काञ्ची।
सात धान्य : उड़द, गेहूँ, चना, चांवल, जौ, मूँग, बाजरा।

आठ मातृका : ब्राह्मी, वैष्णवी, माहेश्वरी, कौमारी, ऐन्द्री, वाराही, नारसिंही, चामुंडा।
आठ लक्ष्मी : आदिलक्ष्मी, धनलक्ष्मी, धान्यलक्ष्मी, गजलक्ष्मी, संतानलक्ष्मी, वीरलक्ष्मी, विजयलक्ष्मी, विद्यालक्ष्मी।
आठ वसु : अप (अह:/अयज), ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष, प्रभास।
आठ सिद्धि : अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व।
आठ धातु : सोना, चांदी, ताम्बा, सीसा जस्ता, टिन, लोहा, पारा।

नवदुर्गा : शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चन्द्रघंटा, कुष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री।
नवग्रह : सुर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु।
नवरत्न : हीरा, पन्ना, मोती, माणिक, मूंगा, पुखराज, नीलम, गोमेद, लहसुनिया।
नवनिधि : पद्मनिधि, महापद्मनिधि, नीलनिधि, मुकुंदनिधि, नंदनिधि, मकरनिधि, कच्छपनिधि, शंखनिधि, खर्व/मिश्र निधि।

दस महाविद्या : काली, तारा, षोडशी, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्तिका, धूमावती, बगलामुखी, मातंगी, कमला।
दस दिशाएँ : पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, आग्नेय, नैॠत्य, वायव्य, ईशान, ऊपर, नीचे।
दस दिक्पाल : इन्द्र, अग्नि, यमराज, नैॠिति, वरुण, वायुदेव, कुबेर, ईशान, ब्रह्मा, अनंत।
दस अवतार (विष्णुजी) : मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि।
दस सति : सावित्री, अनुसुइया, मंदोदरी, तुलसी, द्रौपदी, गांधारी, सीता, दमयन्ती, सुलक्षणा, अरुंधती।

*उक्त जानकारी शास्त्रोक्त 📚 आधार पर... हैं ।*
*यह आपको पसंद आया हो तो अपने बन्धुओं को भी शेयर जरूर कर अनुग्रहित अवश्य करें यह संस्कार का कुछ हिस्सा हैं 🌷 💐*जय श्री राम जय श्री कृष्ण

Tuesday, 31 May 2022

मशरूम की उपयोगिता एवं महत्व

मशरूम का महत्व

 कैंसर: यह प्रोस्टैट और स्तन कैंसरसे बचाता है। इसमें बीटा ग्लूकॉन और कंजुगेट लानोलिक एसिड होता है, जो कि कैंसररोधी प्रभाव छोड़ते हैं।

 मधुमेहः इसमें विटामिन, लवणऔर रेशा होता है। मशरूम में वसा, कार्बोहाइड्रेट और शर्करा नहीं होती है, जो कि मधुमेह रोगियों के लिये जानलेवा है। यह शरीर में इन्सुलिन को भी बनाता है।

 हृदय रोग: मशरूम में उच्च पोषण तत्व पाये जाते हैं। इसलिए यह दिल के रोग के लिये अच्छा होता है। इसमें कुछ तरह के एंजाइम और रेशे पाए जाते हैं ये कोलेस्ट्रॉल के स्तर को कम करते हैं।

मैटाबॉलिज्मः मशरूम में विटामिन'बी' होता है। यह भोजन में पाये जाने वाले ग्लूकोज को बदल कर ऊर्जा पैदा करता है। विटामिन 'बी' और बी. इस कार्य के लिये उत्तम हैं।

प्रतिरक्षा प्रणाली को बढ़ावा: मशरूम में उपस्थित एंटीऑक्सीडेंट फ्री अवयव से बचाता है। यह शरीर में एंटीवायरल और अन्य प्रोटीन की मात्रा बढ़ाता है। यह कोशिकाओं के पुनः निर्माण में सहायक होता है। यह सूक्ष्मजीवी और अन्य फफूंद संक्रमण को ठीक करता है।

मोटापा कम करने में सहायकः इसमें लीन प्रोटीन होता है। यह मोटापा घटाने में बड़ा योगदान करता है। मोटापा कम करने वालों को प्रोटीनयुक्त भोजन पर रहने को बोला जाता है, जिसमें मशरूमखाना अच्छा माना जाता है।

पोषकीय महत्व

मशरूम में पोषक तत्व अधिकांश सब्जियों की तुलना में अधिक पाये जाते हैं। इसकी खेती पोषकीय एवं औषधीय लाभ के लिये की जाती है, जिनका संक्षिप्त विवरण निम्न प्रकार है:

  • मशरूम में लगभग 22-35 प्रतिशत उच्च कोटि की प्रोटीन पायी जाती है, जिसकी पाचन शक्ति 60-70 प्रतिशत तक होती है।
  • इसके प्रोटीन में सभी आवश्यक तत्व जैसे-अमीनो अम्ल, मेथियोनिन, ल्यूसिन, आइसोल्यूसिन, लाइसिन, थायमीन, वैलीन, हिस्टीडिन, आर्जीनिन, आदि प्राप्त होते हैं, जो दालों में भी प्रचुर मात्रा में नहीं पाये जाते हैं। इसमें कालवासिन, क्यूनाइड, लेंटीनिन, क्षारीय और अम्लीय प्रोटीन की उपस्थिति मानव शरीर में ट्यूमर बनने से रोकती है।
  • मशरूम में 4-5 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट्स पाये जाते हैं, जिसमें मैनीटाल 0.9, हेमी सेल्यूलोज 0.91 और ग्लाइकोजन 0.5 प्रतिशत विशेष रूप से पाया जाता है।
  • ताजे मशरूम में पर्याप्त मात्रा में रेशे (लगभग 1 प्रतिशत) व कार्बोहाइड्रेट तन्तु होते हैं। यह कब्ज, अपचन, अति अम्लीयता सहित पेट के विभिन्न विकारों को दूर करता है। इसके साथ ही यह शरीर में कोलेस्ट्रॉल एवं शर्करा के अवशोषण को भी कम करता है।
  • इसमें वसा न्यून मात्रा (0.3-0.4 प्रतिशत) में पाई जाती है तथा आवश्यक वसा अम्ल, प्लिनोलिक एसिड प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होता है। प्रति 100 ग्राम मशरूम से लगभग 35 कि.ग्रा. कैलोरी ऊर्जा प्राप्त होती है।
  • मशरूम में शर्करा (0.5 प्रतिशत) और स्टार्च की मात्रा अल्प होने के कारण मधुमेह रोगियों के लिये यह एक महत्वपूर्ण आहार माना जाता है।
  • इसमें प्यूरीन, पायरीमिडीन, क्यूनान, टरपेनाइड इत्यादि तत्व होते हैं, जो जीवाणुरोधी क्षमता प्रदान करते हैं।
  • इसमें विटामिन 'ए', 'डी' और 'के' नहीं पाया जाता है, लेकिन एर्गोस्टेरॉल पायाजाता है, जो मानव शरीर के अंदर विटामिन 'डी' में परिवर्तित हो जाता है।
  •  इसमें आवश्यक विटामिन जैसे-थायमीन, राइबोफ्लेविन, नायसीन, बायोटिन, एस्कार्बिकएसिड और पेंटाथोनिक एसिड पाया जाता है।
  • मशरूम में उत्तम स्वास्थ्य के लिए सभी प्रमुख खनिज लवण जैसे- पोटेशियम, फॉस्फोरस, गंधक, कैल्शियम, लोहा, तांबा, आयोडीन और जिंक आदि भी प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। ये खनिज, अस्थियों, मांसपेशियों, नाड़ी संस्थान की कोशिकाओं तथा शरीर की क्रियाओं में सक्रिय योगदान करते हैं। मशरूम में लौह तत्व कम मात्रा में पाया जाता है फिर भी रक्त में हीमोग्लोबिन के स्तर को बनाये रखता है। इसके साथ ही इसमें बहुमूल्य फोलिक एसिड की उपलब्धता होती है, जो केवल मांसाहारी खाद्य पदार्थों से प्राप्त होता है। अतः लौह तत्व एवं फोलिक एसिड के कारण यह रक्त की कमी से गकस्त अधिकांश ग्रामीण महिलाओं एवं बच्चों के लिये उत्तम आहार है।
  • हृदय रोगियों की आहार योजना में मशरूम को शामिल करना उपयोगी पाया गया है, क्योंकि यह शर्करा एवं कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित कर रक्त संचार को बढ़ाता है।
  • मशरूम गर्भवती महिलाओं, बाल्यावस्था, युवावस्था तथा वृद्धावस्था तक सभी चरणों में कुपोषण से बचाव में अति उपयोगी पाया गया है।
  • इसमें सोडियम वर्षट नहीं पाया जाता है जिसके कारण मोटापा, गुर्दा और हृदयघात से पीड़ित रोगियों के लिये यह महत्वपूर्ण आहार है

Sunday, 26 April 2020

🙏वैष्णो देवी मंदिर की स्थापना कैसे हुई🙏

अचानक एक तूफान की लहर से चीन की वहां से निकल कर आई और उसने देखते ही देखते भारत में तूफान मचा दिया जिससे कोविड-19 वायरस का नाम से जाना गया 

Wednesday, 15 April 2020

🙏🙏🙏कोरोना महामारी में सहयोग 🙏🙏🙏

ग्रीष्म ऋतु में विशाल जंगल में भयानक आग लगी हुई थी। जंगली जीव जंतु आग के मारे परेशान हो रहे थे ।कई जीव जंतु विशाल आग में  जलकर अपने प्राणों की आहुति दे रहे थे ।अर्थात काल के मुख में समा रहे थे ।

ईस टांडव के कारण चारों ओर कोहराम मचा हुआ था। आग पर काबू पाने के लिए सभी व्यक्ति अपने ۔अपने तरीके से प्रयास कर रहे थे ।फायर ब्रिगेड चल रही थी कोई बाल्टी' गुंडीٗ जिसको जैसा साधन मिला उसी से पानी डाल कर आग पर काबू करना चाह रहे थे। यह दृश्य एक नन्ही सी चिड़िया देख रही थीٗ उसने सोचा कि जब इतिहास रच आएगा तब मेरा भी नाम आना चाहिए। इसीलिए उस नन्ही चिड़िया ने भी अपना योगदान देना चाहा ।वह भी इस कार्य में जुट गई नन्ही सी चिड़िया भी अपने चोच में पानी भरती थी और उस आग में छोड़ती थी। इसी प्रकार वह नन्ही चिड़िया भी इस प्रकार कार्य करने लगी। इसी नन्ही चिड़िया की उत्साह और उमँग को देखकर मेरे मन में भी َ!इस ग्रीष्म ऋतु मे” दुनिया रूपी विशाल जंगल में कोरोना रूपी विशाल आग लगी हुई है। इस कोरोना रूपी आग में नन्ही सी चिड़िया के भाती योगदान करने का विचार आया मन रूपी चोच से विचार रूपी पानी का छिड़काव करने की कोशिश कर रहा हूं ।
 ईस प्रकार अभी इस कोरोना महामारी की भयानक आग दुनिया में लगी  है ।    प्रत्येक प्राणी से नम्र निवेदन है  कि उस  चिड़िया की तरह हम भी इसमें सहयोग करें योगदान दें ताकि इतिहास में हमारा नाम भी आए इस छोटी सी कहानी के माध्यम से सरकार द्वारा लाख डाउन अवधि में दिए गए नियमों का पालन करें या करवाएं कृपया अपने घरों में ही रहे सरकार की बार-बार अपील है और  विचार करो कि करोना कोई हंसी मजाक में लेने वाली बीमारी नहीं है यह वास्तव में साक्षात मां दुर्गा का रूप है क्योंकि दुर्गा सप्तशती के अध्याय नंबर 12 और इसलोक नंबर 39-40 में स्पष्ट कहा गया है ।
कि अभ्युदय के समय में ही पृथ्वी पर धन समृद्धि और ऐश्वर्य बरसाती हूं ।और विनाश के समय में ही भयानक रूप लेकर के महामारी के रूप में विनाश करती हूं ।इसी प्रकार यह दुर्गा साक्षात महामारी का रुप ले कर आई है ।इससे बचने के लिए देवी आराधना एवं पूर्ण परमात्मा जो कि मां दुर्गा से भी बड़ा है उनकी आराधना करना ही श्रेष्ठ कर है ।इसे समझने के लिए संत रामपाल जी महाराज की पुस्तकें एवं उनका सत्संग सुनाना आवश्यक है ।तथा उनकी राह पर चलना आवश्यक है

Thursday, 20 February 2020

काल( ब्रह्म) की अव्यक्त (गुप्त )रखने की प्रतिज्ञा

काल (ब्रह्म) की अव्यक्त (गुप्त) रहने की प्रतिज्ञा

ब्रह्मा विष्णु महेश तीनों पुत्रों की उत्पत्ति के पश्चात काल (ब्रहा) अपनी पत्नी दुर्गा (प्रकृति) से कहा मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि; भविष्य में मैं किसी को अपने वास्तविक रूप में दर्शन नहीं दूंगा। जिस कारण से मैं (गुप्त) अव्यक्त माना जाऊंगा। दुर्गा से कहा कि आप मेरा भेद किसी को मत देना। मैं गुप्त रहूंगा दुर्गा ने पूछा कि क्या आप अपने पुत्रों को भी दर्शन नहीं दोगे? मैं अपने पुत्रों को भी तथा अन्य को किसी भी साधन से दर्शन नहीं दूंगा। यह मेरा अटल नियम रहेगा। दुर्गा ने कहा यह तो आपका उत्तम ज्ञान नहीं है।
जो आप अपने संतान से भी छुपे रहोगे ।तब काल ने कहा दुर्गा मेरी विवशता है। मुझे एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों का आहार करने का श्राप लगा है। यदि मेरे पुत्र ब्रह्मा विष्णु महेश को पता लग जाए ,तो यह उत्पत्ति स्थिति तथा सहार का कार्य नहीं करेंगे। इसीलिए यह मेरा  नियम सदा रहेगा ।जब ये तीनों कुछ बड़े हो जाएंगे ,तो इन्हें अचेत कर देना मेरे विषय में नहीं बताना ।नहीं तो मैं तुझे भी दंड दूंगा। दुर्गा ईस डर के मारे वास्तविकता नहीं बताती, इसीलिए गीता अध्याय नंबर 7 श्लोक नंबर 24 में कहा है। कि यह बुद्धिहीन जनसमुदाय मेरे उत्तम नियम से अपरिचित है। कि मैं कभी भी किसी के सामने प्रकट नहीं होता ,अपनी योग माया से छुपा रहता हूं इसीलिए मुझ अव्यक्त को मनुष्य रूप में आया हुआ अर्थात कृष्ण मानते हैं ।गीता अध्याय नंबर 11 श्लोक नंबर 47 48 में का है कि यह मेरा वास्तविक रूप कॉल रुप है। इसके दर्शन अर्थात ब्रह्म प्राप्ति न वेदों में वर्णित विधि से, न जप से न तब से तथा न किसी क्रिया से हो सकती है ।जब तीनों बच्चे युवा हो जाए तब माता भवानी प्रकृति दुर्गा ने कहा, कि तुम सागर मंथन करो ।
प्रथम बार सागर मंथन किया तो जोत निरंजन ने अपने स्वासो द्वारा चार वेद उत्पन्न की।  उन को गुप्त वाणी द्वारा आज्ञा दी कि सागर में निवास करो। चारों वेद निकले वह ब्रह्मा ने ले लिए, वस्तु लेकर तीनों बच्चे माता के पास आ गए ।तब माता ने कहा कि चारों वेद ब्रह्मा रखे व पड़े ।
नोटः- वास्तव में पूर्ण  ब्रह्म अर्थात काल को पांच वेद प्रदान किए थे ।लेकिन ब्रह्म ने केवल चार वेद को प्रकट किया। पांचवें वेद छुपा दिया जो पूर्ण परमात्मा ने स्वयं प्रकट होकर कबीर अर्थात कबीर वाणी द्वारा लोकोक्तियों व दोहे के माध्यम से प्रकट किया है।
दूसरी बार मंथन किया तो तीन कन्याए मिली माता ने तीनों को बांट दिया। दुर्गा ने अपने ही अन्य तीन रूप सावित्री, लक्ष्मी ,तथा पार्वती धारण किए तथा  समुद्र में छिपा दी ।सागर मंथन के समय बाहर आ गई, वही प्रकृति तीन रूप हुई तथा भगवान ब्रह्मा जी को सावित्री, भगवान विष्णु जी को लक्ष्मी, भगवान शंकर जी को पार्वती रूप में दी ।तीनों ने भोग विलास किया  तीसरी बार सागर मंथन किया तो 14 रत्न ब्रह्मा को तथा अमृत विष्णु को वह देवताओं को मर्द शराब असुरों को तथा विष पदार्थ शिव ने अपने कंठ में ठहराया। यह तो बहुत बाद की बात है जब ब्रह्मा वेद पढ़ने लगे तो पता चला कि कोई सर्व ब्रह्मांड की रचना करने वाला कुल मालिक पुरुष प्रभु और है ।तब ब्रह्मा जी ने विष्णु जी व शंकर जी को बताया कि वेद में वर्णन है, कि सिरजनहार कोई और प्रभु है ।परंतु वेद कहते हैं कि भेद हम भी नहीं जानते उनके लिए संकेत है। कि किसी तत्वदर्शी संत से पूछो
।जब ब्ह्ब्ह्मा पास आया सब वृत्तांत कह सुनाया । माता कह रही थी कि मेरे अतिरिक्त और कोई नहीं है मैं ही करता हूं ।मैं ही सर्वशक्तिमान हूं ,परंतु ब्रह्मा ने कहा कि वेद इस वक्त है यह झूठ नहीं हो सकता। दुर्गा ने कहा कि तेरे पिता तुझे दर्शन नहीं देगा। उसने प्रतिज्ञा की हुई है। तब ब्रह्मा ने कहा माता जी अब आपकी बात पर विश्वास नही हो  रहा है ।मैं उस पुरुष( प्रभु ) का पता लगा कर ही रहूंगा । तब दुर्गा ने कहा कि यदि वह तुझे दर्शन नहीं देगा तो तुम क्या करोगे ब्रह्मा ने कहा कि मैं आपको शक्ल नहीं दिखाऊंगा । दूसरी तरफ जोत निरंजन ने कसम खाई है कि मैं अव्यक्त (गुप्त) रहूंगा। किसी को दर्शन नहीं दूंगा अर्थात 21 ब्रह्मांड में कभी भी आपके अपने वास्तविक (काल) रूप में  मैं नहीं आऊंगा। गीता अध्याय नंबर 7 श्लोक नंबर 24 ,25 में इसका विस्तृत वर्णन हैं।परमात्मा के ईस ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाए और इस गुप्त ज्ञान को समझे और ईस गुप्त ज्ञान को समझें समझाएं अधिक जानकारी के लिए ज्ञान गंगा पुस्तक निशुल्क मंगवा कर पढ़े और समझे या ullekhgyansagarblag.पर सर्च करें ।

Thursday, 26 December 2019

माता दुर्गा द्वारा ब्रह्मा को श्राप देना

माता दुर्गा द्वारा ब्रह्मा को श्राप देना

जब माता ने ब्रह्मा से पूछा क्या तुमने पिता के दर्शन किये? ब्रह्मा ने कहा हां मां मुझे पिता के दर्शन हुए। दुर्गा ने कहा साक्षी बता, तब ब्रह्मा ने कहा इन दोनों के समक्ष दर्शन हुए। देवी दुर्गा ने उन दोनों लड़कियों से पूछा क्या तुम्हारे सामने ब्रह्मा को दर्शन हुए? तब दोनों ने कहा कि हां हमने अपनी आंखों से देखा है। हमारे सामने उन्हें दर्शन हुए ,तब भवानी प्रकृति को संचय हुआ कि मुझे तो ब्रह्म( काल )ने कहा था कि मैं किसी को दर्शन नहीं दूंगा।
चाहे कुछ हो जाए परंतु यह कहते हैं, कि दर्शन हुए तब दुर्गा ने ध्यान लगाकर और कॉल जोत निरंजन से पूछा, कि यह क्या कहानी है। जोत निरंजन ने कहा कि यह तो झूठ बोल रहे हैं ।तब माता ने कहा तुम झूठ बोल रहे हो आकाशवाणी हुई है। कि उन्होंने किसी को दर्शन नहीं दिए यह बात सुनकर ब्रह्मा ने कहा कि माताजी में सोंगध खाकर पिता की तलाश करने गया था। परंतु पिता के दर्शन नहीं हुए आपके पास आने में शर्म लग रही थी। इसलिए हमने झूठ बोल दिया ।तब माता दुर्गा ने कहा कि मैं तुम्हें शराब देती हूं।
 ब्रह्मा को श्राप:- तेरी पूजा जग में नहीं होगी। आगे तेरे वंशज होंगे वे बहुत पाखंड होंगे झूठी बात बनाकर जग्ग ठगी ऊपर से तो कर्मकांड करते दिखाई देंगे ।मगर अंदर से विकार करेंगे कथा पुरानो को पढ़कर सुनाया करेंगे। स्वयं को ज्ञान नहीं होगा की सद ग्रंथों में वास्तविक क्या है। फिर भी मानवास तथा धन प्राप्ति के लिए गुरु बनकर अनुयायियों को लोक वेद शास्त्र विरुद्ध अंत कथा सुनाया करेंगे। देवी देवताओं की पूजा करके तथा करवा के दूसरों की निंदा करके कष्ट पर कष्ट उठाएंगे। जो उनके अनुयाई होंगे उनको परमार्थ नहीं बताएंगे दक्षिणा के लिए जगत को गुमराह करते रहेंगे। अपने आप को सबसे श्रेष्ठ मानेंगे दूसरों को नीचा समझेंगे। जब माता के मुख से यह सुना तो ब्रह्मा मूर्छित होकर जमीन पर गिर गया। बहुत समय उपरांत होश आया।
गायत्री को श्राप:- तेरे इस प्रकार घिनौनी हरकत के कारण तेरे कई बैल पति होंगे। और तू मृत्यु लोक में गाय बनेगी।
सावित्री को श्राप:- तेरी जगह गंदगी में होगी ।तेरे फूलों को कोई पूजा में नहीं लेगा। इसी झूठी गवाही के कारण तुझे यह नरक भोगना पड़ेगा। तेरा नाम कीवडा केतकी होगा हरियाणा में कुसौंधी कहते हैं। यह गंदगी को ऑडियो वाली जगह में होती है।
इस प्रकार तीनों को श्राप देकर माता भवानी दुर्गा बहुत पछताई। इस प्रकार पहले तो जीव बिना सोचे मन काल (निरंजन) के प्रभाव से गलत कार्य कर देता है। परंतु जब शरद पूर्व सांसद के प्रभाव से उसे ज्ञात होता है तो पीछे पछताना पड़ता है। जिस प्रकार माता पिता अपने बच्चों को छोटी सी गलती के कारण  क्रोध वश होकर, परंतु बाद में बहुत पछताते हैं। यही प्रक्रिया मन काल (निरंजन) के प्रभाव से सर्व जीवो में क्रिया वान हो रही है। हां एक बात विशेष है कि निरंजन काल ब्रह्म ने भी अपना कानून बना रखा है। कि यदि कोई जीव किसी दुर्बल जीव को सताएगा तो उसे उसका बदला देना पड़ेगा। जब आदि भवानी दुर्गा ने ब्रह्म गायत्री व सावित्री को श्राप दिया तो (अलख निरंजन) काल ब्रह्म ने कहा कि यह दुर्ग यह आपने अच्छा नहीं किया। अब मैं निरंजन आप को श्राप देता हूं। कि द्वापर युग में तेरे भी पांच पति होगी अर्थात द्रोपति ही आदि माया का अवतार होगी। जब यह आकाशवाणी सुनी तो आदि माया ने कहा जोत निरंजन काल मैं तेरे बस में पड़ी हूं ।जो चाहे सो कर ले।
सृष्टि रचना में दुर्गा जी के अन्य नामों का बार-बार लिखने में का उद्देश्य है। कि पुराना गीत आदत है वेदों में प्रमाण देखते समय भर्म उत्पन्न नहीं होगा। जब जैसे गीता अध्याय नंबर 14 लोक नंबर 34 में काल ब्रह्म ने कहा कि प्रकृति तो गर्भधारण करने वाली सब जीवो की माता है। मैं उसके गर्भ में बीज स्थापित करने वाला पिता हूं। ईसलोक 4 में कहा गया है। कि प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण जीवात्मा को कर्मों के बंधन में बांधते हैं। इस प्रकार में प्रकृति तो दुर्गा है। तथा तीनों गुण तीनों देवता यानी रज गुण ब्रह्मा, सद्ग गुण  विष्णु ,तम गुण शिव के सांकेतिक नाम है।

Sunday, 22 December 2019

(तत्वज्ञान ) श्री ब्रह्मा जी ,श्री विष्णु जी ,श्री शिव जी ,की उत्पत्ति का रहस्य।

श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी , श्री शिन्व जी की, _त्उत्पत्ति 

काल (ब्राह्) ने (प्रकृति) दुर्गा से कहा कि अब मेरा कौन क्या बिगड़ेगा? मनमानी हरकत करूंगा। प्रकृति( दुगा )ने फिर प्रार्थना कि की आप कुछ शर्म करो।प्रथम तो आप मेरे बड़े भाई हो, क्योंकि उस पूर्ण परमात्मा कबीर के वचन शक्ति से बने अंडे से आप की उत्पत्ति हुई है । तथा बाद में मेरी उत्पत्ति उसी परमेश्वर के वचन शक्ति से उई है। दूसरे मैं आपके पेट से बाहर निकली हूं ,मैं आपकी बेटी ,तथा आप मेरे पिता हुए। इस पवित्र नातो मैं बिगाड़ करना महापाप होगा। मेरे पास पिता की प्रदान की हुई  शब्द शक्ति है, जितने प्राणी आप चाहोगे मैं वचन से उत्पन्न कर दूंगी। जोत निरंजन ने दुर्गा की एक भी विनय नहीं सुनी। तथा कहा कि मुझे जो सजा मिलनी थी। मिल गई मुझे सतलोक से निष्कासित कर दिया। अब मनमानी करूंगा यह कह कर काल पुरुष ने प्रकृति के साथ जबरदस्ती शादी की ।तथा तीन पुत्र रज गुण ब्रह्मा जी, सद्गुण विष्णु जी, तथा तम गुण शिव जी, की उत्पत्ति की।
जवान होने तक तीनों पुत्रों को दुर्गा के द्वारा अचेत करा देता है। फिर युवा होने पर श्री ब्रह्मा जी को कमल के फूल पर, श्री विष्णु जी को शेषनाग की सैया पर, तथा श्री शिव जी को कैलाश पर्वत पर, सचेत कर देता है। तत्पश्चात (प्रकृति ) दुर्गा द्वारा इन तीनों का विवाह कर दिया जाता है । तथा एक ब्रह्मांड में तीन लोक स्वर्ग लोक, पृथ्वी लोक ,पाताल लोक, में एक एक  विभाग के मंत्री नियुक्त कर देता है। जैसे श्री ब्रह्मा जी को रजगुण विभाग ,तथा विष्णु जी को सतगुण  विभाग, तथा शिव शंकर जी को तमोगुण विभाग का ,तथा स्वयं  गुप्त महा ब्रह्मा ,महा विष्णु ,महा शिव ,रूप में मुख्यमंत्री पद को संभालता हैः। एक ब्रह्मांड में एक ब्रह्मलोक की रचना की है ।
उसी में तीन गुप्त स्थान बनाए हैं, एक रजोगुण प्रदान स्थान, जहां पर यह काल स्वयं ब्रह्मा मुख्यमंत्री रूप में रहता है ।तथा अपनी पत्नी दुर्गा को महा सावित्री रूप में रखता है। इन दोनों के सहयोग से जो पुत्र ईस स्थान पर उत्पन्न होता है ,वह स्वता ही रजोगुण बन जाता है ।
दूसरा स्थान सतोगुण प्रधान स्थान बनाया है। वहां पर यह काल पुरुष विष्णु रूप बनकर रहता है ।तथा अपनी पत्नी दुर्गा को लक्ष्मी रूप में रखकर जो पुत्र उत्पन्न करता है ।उसका नाम विष्णु रखता है ,वह बालक सतोगुण युक्त होता है।
तीसरा इसी काल ने वहीं पर एक तमोगुण प्रधान क्षेत्र बनाया उसमें यह स्वयं सदाशिव रूप बनाकर रहता है ।तथा अपनी पत्नी दुर्गा को महा पार्वती रूप में रखता है। इन दोनों के पति पत्नी व्यवहार से जो पुत्र उत्पन्न होता है उसका नाम शिव रख देते हैं ।तथा तमोगुण युक्त कर देते हैं।
(प्रमाण के लिए देखें पवित्र शिवपुराण ,बिंदेश्वर संहिता पृष्ठ नंबर 24 ,26 जिसमें ब्रह्मा विष्णु तथा महेश से अन्य सदस्य है ।तथा रूद्र संहिता अध्याय 6 तथा 7,9 पृष्ठ 100 से 150 ,110 पर अनुवाद करता ,श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित है।)फिर इन्हीं को धोखे में रखकर अपने खाने के लिए जिवो की उत्पत्ति  श्री ब्रह्मा जी द्वारा  एक दूसरे को मोह माया में रखकर काल जाल में रखना। श्री विष्णु जी से पालन तथा शिवजी से संहार ।
क्योंकि काल पुरुष को श्राप वस एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों के सूक्ष्म शरीर से मैल निकालकर खाना होता है ।उसके लिए 21 ब्रह्मांड में एक तप्तशीला है, जो हमेशा गर्म रहती है। उस पर गर्म करके मैल पिघलाकर खाता है। जिव मरते नहीं है। परंतु कष्ट असहनिया होता है । फिर प्राणियों को कर्म आधार पर अन्य शरीर प्रदान करता है। जो कार्य श्री शिव जी द्वारा करवाता है ।जैसे किसी मकान में तीन कमरे बने हो, एक कमरे में अश्लील चित्र लगे हो, उस कमरे में जाते ही मन में वैसे ही मलिन विचार उत्पन्न हो जाते हैं। दूसरे कमरे में साधु संतो भक्तों के चित्र लगे हो तो मन में अच्छे विचार प्रभु का चिंतन ही बना रहता है। तीसरे कमरे में देशभक्तों वह शहीदों के चित्र लगे होते हैं ,तो मन में वैसे ही जोशीले विचार उत्पन्न हो जाते हैं ।ठीक इसी प्रकार (ब्रह्मा) काल ने अपने सूझ -बूझ से उपरोक्तअनुसार तीन गुन प्रधान स्थानों की रचना की है।
अधिक जानकारी या आगे पीछे का पढ़ने के लिए उल्लेख ज्ञानसागर ब्लॉक या www.dkmalviyaddresblagcom सर्च करें और इस गूढ़ रहस्य को ग्रहण करें। भोली आत्माओ जय बंदी छोड़ की जय।

Friday, 20 December 2019

🙏🙏 हैप्पी न्यू ईयर 2020 🙏🙏हम काल के लोक में कैसे आए 84 लाख योनि भुगतने🙏🙏

 नए वर्ष 2020 की आप सभी को हार्दिक शुभकामना। ''जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा है। हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई ,धर्म नहीं कोई न्यारा है,,।
इस  कॉल  परमेश्वर के लोक में  प्रत्येक प्राणी ( जीवात्मा)  किसी न किसी कारण  परेशान है। कोई  बीमारी के कारण दुखी,  कोई जमीन जायदाद के कारण दुखी है,  कोई शादी ब्याह के कारण दुखी है , इस संसार में और न जाने किन किन कारणों से प्रत्येक प्राणी दुखी है। 
यह दुख का  एक ही कारण है। शास्त्र विरुद्ध साधना  करना। इससे बचने के लिए  आप  सन 2020 से  शास्त्र अनुकूल साधना  करने का प्रण ले,  और  आज ही  " शास्त्र अनुकूल साधना क्या है " को सर्च करें  और इस पर अमल करें ।इसी का एक छोटा सा उदाहरण जिव इस संसार में कैसे आए ।जीस समय सतलोक मे  क्षर पुरूष (जोत निरंजन) एक पैर पर खड़ा होकर तप कर रहा था ।तब हम सभी आत्माएं इस क्षर पुरुष पर आकर्षित हो गए । जैसे जवान बच्चे ,अभिनेता व अभिनेत्री पर आसक्त हो जाते हैं ।लेना एक न देना दो ।व्यर्थ में चाहने लग जाते हैं। वे अपनी कमाई करने के लिए नाचते कूदते हैं। युवा बच्चे उन्हें देखकर अपना धन नष्ट करते हैं। ठीक इसी प्रकार हम अपने परमपिता सत्पुरुष को छोड़कर काल पुरुष (क्षर पुरूष) को हृदय से चाहने लगे ,जो परमेश्वर हमें सर्व सुख सुविधा दे रहा था। उससे मुंह मोड़ कर इस नकली ड्रामा करने वाले काल ब्रह्म को चाहने लगे ।सतगुरु जी ने बीच-बीच में बहुत बार आकाशवाणी कि ।की बच्चों  इस काल के क्रिया को मत देखो मस्त रहो। हम ऊपर से तो सावधान हो गए परंतु अंदर से चाहते रहे। परमात्मा तो अंतर्यामी है ।उन्होंने जान लिया कि यहां रखने के योग्य नहीं है ।काल पुरुष ने जब दो बार जप करके फल प्राप्त कर लिया तब उसने सोचा। कि आब कुछ जीवात्मा भी मेरे साथ रहनी चाहिए। मेरा अकेले का दिल नहीं लगेगा इसीलिए जीवात्मा प्राप्ति के लिए तप करना शुरू किया ।
64 युग तक तप करने के पश्चात, परमेश्वर जी ने पूछा, कि जोत निरंजन अब किस लिए तप कर रहे हो ।क्षर पुरुष ने कहा कि कुछ आत्माएं प्रदान करो ।मेरा अकेले का दिल नहीं लगता सत्पुरुष ने कहा कि तेरे तप के बदले में और ब्रह्मांड दे सकता हूं। परंतु अपनी आत्माएं नहीं दूंगा । यह मेरे शरीर से उत्पन्न हुई है ।हां यदि  स्वयं जाना चाहते हैं। तो वह जा सकते हैं। इस प्रकार कबीर परमेश्वर के वचन सुनकर जोत निरंजन हमारे पास आया ।हम सभी हंस आत्माएं पहले से ही उस पर आसख्त थी ।हम उसे चारों तरफ से घेर कर खड़े हो गए जोत निरंजन ने कहा कि मैंने पिताजी से अलग 21 ब्रह्मांड प्राप्त किए हैं ।वहां नाना प्रकार के रमणीय स्थल बनाए हैं। क्या आप मेरे साथ चलोगे हम सभी हंसो ने जो आज 21 ब्रम्हांड में परेशान हैं ।कहां कि हम तैयार है यदि  पिताजी आज्ञा दे तब क्षरपुरुष (काल) पूर्ण ब्रह्म ( कबीर परमेश्वर) के पास गया तथा सर्वर वार्ता की तब कबीर परमेश्वर ने कहा कि मेरे सामने स्वीकृत देने वाले को आज्ञा दूंगा ।क्षर पुरुष तथा परम अक्षर पुरुष दोनों हम सभी आत्माओं के पास आए ।पुरुष ने कहा कि जो आत्माएं ब्रह्म (कााल)के साथ जाना चाहती है हाथ ऊपर करके स्वीकृति दे अपने पिता के सामने किसी की हिम्मत नहीं हुई । किसी ने स्वीकृति नहीं दी परंतु कुछ समय तक सन्नाटा छाया रहा। तत्पश्चात एक हंस आत्मा ने साहस किया तथा कहा कि पिताजी मैं जाना चाहती हूं ।फिर तो उसकी देखा देखी हम सभी आत्माओं ने स्वीकृति दे दी ।परमेश्वर कबीर जी ने ज्योति निरंजन (क्षर पुरूष)से कहा कि आप अपने स्थान पर जाओ जिन्होंने तेरे साथ जाने की स्वीकृति दी है ।मैं उस सर्व आत्माओं को आप के पास भेज दूंगा जोत निरंजन अपने 21 ब्रह्मांडो में चला गया ।उस समय तक यह 21 ब्रह्मांड सतलोक में थे।
तत्पश्चात पूर्ण ब्रह्म ने सर्वप्रथम स्वीकृति देने वाले हंस को लड़की  का रूप दिया परंतु स्त्री इंद्री नहीं रखी ।तथा सर्व आत्माओं को जिन्होंने निरंजन के साथ जाने की सहमति दी थी। उस लड़की के शरीर में प्रवेश करा दिया ।तथा उसका नाम दुर्गा पड़ा। तथा सत्पुरुष ने कहा कि पुत्री मैंने तेरे को शब्द शक्ति प्रदान कर दी है। जितने जीव ब्रह्म कहे आप अपनी शब्द शक्ति से उत्पन्न कर देना पूर्ण ब्रह्म कबीर देव ने अपने पुत्र सहज दास के द्वारा (प्रकृति ) दुर्गा को सर पुरुष के पास भिजवा दिया ।सहजदास जी ने जोत निरंजन को बताया कि पिताजी ने ईस दुर्गा बहन के शरीर में उन सब आत्माओं को प्रवेश कर दिया है। जिन्होंने आपके साथ जाने की सहमति व्यक्त की थी ।उसको वचन शक्ति प्रदान की है ।और जीतने जीव चाहूंगी ।प्रकृति अपने शब्द से उत्पन्न कर देगी। यह कह कर शहज दास अपने देश में वापस आ गया।
युवा होने के कारण लड़की का रंग रूप निखरा हुआ था ब्रह्म (काल) के अंदर विषय वासना उत्पन्न हो गई ।तथा (प्रकृति ) दुर्गा देवी के साथ अभद्र गतिविधि प्रारंभ की ।तथा दुर्गा ने कहा कि जोत निरंजन मेरे पास पिताजी की प्रदान की हुई शब्द शक्ति है ।आप जितने प्राणी कहोगे मैं वचन शक्ति से उत्पन्न कर दूंगी। आप मिथुन परंपरा शुरु मत करो। आप भी उसी पिता के शब्द के अंडे से उत्पन्न हुए हो, तथा मैं भी उसी परम पिता के वचन से ही बाद में उत्पन्न हुई हूं ।आप मेरे बड़े भाई हो ।बहन भाई का यह योग महापाप का कारण बनेगा ।परंतु ज्योति निरंजन ने प्रकृति देवी की एक भी प्रार्थना नहीं सुनी ,तथा अपनी शब्द शक्ति द्वारा नाखूनों से स्त्री इंद्र प्रकृति को लगा दी ।तथा हठपूर्व मैथुन करने की ठानी ।उसी समय दुर्गा ने अपनी  रक्षा के लिए कोई और चारा ना देख कर सूक्षम रूप बनाया ।तथा जोत निरंजन के खुले मुख के द्वारा पेट में प्रवेश करके पूर्ण ब्रह्म कबीर देव को रक्षा के लिए याचना की। उसी समय परमेश्वर कबीर देव अपने पुत्र का रूप बनाकर वहीं प्रकट हुए ,तथा कन्या को ब्रह्म(काल) के उधर से बाहर निकाला ।कहा कि जोत निरंजन आज से तेरा नाम काल होगा। तेरे जन्म मृत्यु होंगे। इसीलिए तेरा नाम क्षर पुरुष होगा ।तथा एक लाख मानव शरीर धारी प्राणियों को प्रतिदिन खाया करेगा ।व सवा लाख उत्पन्न किया करेगा ।आप दोनों को यहा से प्रमाण सहित निष्कासित किया जाता है ।इतना कहते ही 21 ब्रह्मांड विमान की तरफ चल पड़े योगदास के दीप के पास से होते हुए सतलोक से 16 शंख कोस की दूरी पर आकर रुक गए
**विशेष विवरण:-  अब तक तीन शक्तियों का विवरण आया है ।
*1 :-पूर्ण ब्रह्म जिसे अन्य महात्मा नामों से भी जाना जाता है जैसे :-सत्पुरुष ,अकाल पुरुष ,शब्द सरूपी राम ,परम अक्षर ब्रह्म ,पूर्व शादी यह पूर्ण ब्रह्म ,असंख्य ब्रह्मांड का स्वामी है ।तथा वास्तव में अविनाशी है।
*2:-  परब्रह्म, जिसे अक्षर पुरुष भी कहा जाता है ।यह वास्तव में अविनाशी नहीं है ।यह सात खंड ब्रह्मांडो  का स्वामी है ।
*3:- ब्रह्म ',जिसे ज्योति निरंजन, काल, क्षर पुरुष ,तथा धर्म राय ,आदि नामों से जाना जाता है ।जो केवल 21 ब्रह्मांड का स्वामी है ।अब आगे इसी ब्रह्मांड काल की सृष्टि के एक ब्राह्मण का परिचय दिया जाएगा। जिसमें 3 और नाम आपके पढ़ने के योग्य ब्रह्मा, विष्णु ,तथा शिव है ।
ब्रह्म तथा ब्रह्मा में भेद एक ब्राह्मणंड में बने सर्वोपरि स्थान पर ब्रह्म स्वयं तीन गुप्त स्थानों की रचना करके ब्रह्मा विष्णु तथा शिव रूप में रहता है ।अपनी पत्नी दुर्गा के सहयोग से तीन पुत्रों की उत्पत्ति करता है ।उनके नाम भी ब्रह्मा विष्णु तथा शिव रखता है। जो ब्रह्मा का पुत्र ब्रह्मा है ,वह एक ब्रह्मांड में केवल 3 लोग पृथ्वी लोक, स्वर्ग लोक ,पाताल लोक ,में 1 विभाग का मंत्री है इसे त्रिलोकी ब्रह्मा कहा जाता है ।तथा ब्रह्म जो ब्रह्मलोक में ब्रह्मा रूप में रहता है उसे महा ब्राह्म ब्रह्मलोक यह ब्रह्मा का जाता है  इसी ब्रह्म काल को सदा शिव महा शिव महा विष्णु भी कहते हैं 
श्री विष्णु पुराण में प्रायः चतुर्थांश अध्याय 1 जस्ट 230 ,231 पर श्री ब्रह्मा जी ने कहा जिस अजन्मा सर्व मैं विधाता परमेश्वर का आदि मध्य अंत स्वरूप स्वभाव और सर हम नहीं जान पाते ।इस बुक नंबर 83
जो मेरा रूप धारण कर संसार की रचना करता है ।स्थिति के समय जो रुद्र रूप से विश्व का ग्रास कर जाता है ।अनंत रूप से संपूर्ण जगत को धारण करता है। इस लोक 86
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तथा समझिए और सद भक्ति की ओर आइए शास्त्र अनुकूल साधना कीजिए। शास्त्र प्रमाणित सही ज्ञान है। सतगुरु देव की जय।

Thursday, 19 December 2019

सफल जीवन के लिए चाणक्य के5 नियम

 विदुर महाभारत के प्रमुख पात्रों में से एक हैं ,और एक दासी पुत्र थे इसलिए उन्हें राजा बनने का अधिकार नहीं था । लेकिन अपनी इंटेलिजेंस और नॉलेज के दम पर भी हस्तिनापुर के प्रधानमंत्री बने थे ।चाहे उन्हें राजा के विरोध का सामना करना पड़े इसलिए धर्मराज भी कहा जाता था ।और टाइम के अनुसार राज्य की भलाई और सफलता के लिए अपनी नीतियां बनाते थे ।और राजा धृतराष्ट्र के साथ और नीतियों पर चर्चा करते थे , सदा अच्छी चीजों का चिंतन करना चाहिए विदुर जी कहते हैं कि जिस चीज के बारे में हम अक्सर सोचते हैं ,बातें करते हैं ,और उसकी तरफ काम करते हैं ,उन्हीं चीजों को हम अपनी और आकर्षित कर लेते हैं जैसे अगर आप दिनभर अपनी किसी प्रॉब्लम के बारे में सोचते रहें और उस से रिलेटेड बातें करते रहे ,तो फिर आपकी प्रॉब्लम कम होने की जगह और बढ़ जाएगी ।वहीं अगर आप उस प्रॉब्लम के सलूशन के बारे में सोचें और उसका सलूशन खोजे तो फिर जल्दी आपकी प्रॉब्लम सॉल्व हो जाएगी। अगर आप अमीर बनना चाहते हैं तो अमीरी के बारे में सोचें ।इस से रिलेटेड बुक्स पढ़ें यूट्यूब पर वीडियो देखें ऐसे लोगों की बातें सुने जो सक्सेसफुल तथा अमीर है ।और नॉलेज हासिल करें इसके ठीक ऑपोजिट अगर आप बस अपनी गरीबी को कोसते रहेंगे दुखी रहेंगे। और कंप्लेंट करते रहेंगे तो बदले में आपको वही चीज मिलेगी ।यानी कि गरीबी कहा जाए तो यहां हजारों वर्ष पहले ही लॉ ऑफ अट्रैक्शन के नियम को बता दिया था जिसे आजकल के बड़े-बड़े विद्वान और सक्सेसफुल लोग भी अपनी जिंदगी में हर जगह यूज करने की बात करते हैं। द्वारा लिखित विश्व प्रसिद्ध किताब द सीक्रेट पर आधारित है। अगर आप भी अपने लाइफ में सक्सेस चाहते हैं तो विदुर नीति के इस नियम को अपने जीवन में उतारें ।

2 :- दूसरा नियम जो अधिक सुने और कम बोले वह बुद्धिमान मनुष्य कहलाता है ।आप अगर दुनिया के सबसे सक्सेसफुल और इंटेलिजेंट लोगों की एक हैबिट पर ध्यान दें ,तो आप पाएंगे कि सारे ही सक्सेसफुल लोग अक्सर कम बोलते हैं। और सुनने पर ज्यादा ध्यान देते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सक्सेसफुल लोग एटीट्यूड वाले होते हैं वह हर वक्त कुछ ना कुछ हर किसी से सीखते रहते हैं ।उन्हें पता होता है कि ज्यादा बोल कर वह बस वही बातें जान सकते हैं ।जो वह पहले से जानते हैं ,जबकि दूसरों की बातें ध्यान से सुनकर कुछ ऐसा नया सीख सकते हैं जिससे वे और ज्यादा सक्सेसफुल बन सकते हैं ।यही बात अपने नियम द्वारा बताने की कोशिश की है ।इसलिए अगर आपको और इंटेलिजेंट बनना है तो किसी से भी बात करते वक्त बोलने से ज्यादा आपको सुनने पर ध्यान देना चाहिए और विदुर नीति के इस प्रमुख नियम को अपने लाइफ में उतारना चाहिए ।
3  :- तीसरा नियम बुरे लोगों के साथ रहने पर बेकसूर लोग भी उन्हीं के समान सजा पाते हैं ।जैसे की सूखी लकड़ियों के साथ गीली भी जल जाती हैं। इसलिए बुरे लोगों के साथ मित्रता नहीं करनी चाहिए ।महा ज्ञानी विदुर के अनुसार यदि आप बुरे या अपराधी लोगों के साथ दोस्ती रखते हैं तो आप बिना किसी कारण के मुसीबत में फंस सकते हैं। जैसे कि अगर आपका दोस्त कोई अपराध किया गलत काम करता है तो आप उसके साथी और दोस्त हो तो भले ही आपने कोई गलती ना की हो लेकिन फिर भी आपको उसी के समान सजा मिल सकती है ।जैसे की सूखी लकड़ियों के साथ गीली लकड़िया भी जल जाती हैं चाहे स्कूल लाइफ हो प्रोफेशनल लाइफ हो या नॉर्मल डे टुडे लाइफ यह बात पूरी तरह से सही है ।जैसे कि कभी-कभी क्लास में एक बच्चे की गलती के कारण पूरी क्लास को सजा मिलती है। या फिर आपका कोई दोस्त राह चलते किसी लड़की या महिला को छोड़ दे ,और आप उस वक्त उसके साथ हो तथा वह महिला पुलिस में कंप्लेंट कर दे ।तो आपके दोस्त के साथ साथ आप पर भी पुलिस केस बन सकता है। भले ही आपने ऐसी कोई गलत हरकत ना की हो इसलिए हमेशा ऐसे लोगों या दोस्तों से दूर ही रहने की सलाह देते हैं ।जो कभी भी आपको किसी अनजान मुसीबत में डाल सकते हैं।
4:-  चौथा नियम जो काम करके अंतकाल में अकेले बैठकर पछताना पड़े उसे शुरू ही नहीं करना चाहिए। ऐसा होता है कि हम बिना सोचे समझे या किसी के बहकावे में कोई काम शुरू तो कर देते हैं ,लेकिन बाद में जाकर हमें पछताना पड़ता है ।कि हमने यह काम क्यों शुरू किया इसलिए हमेशा ऐसा काम करें जिसके बारे में आपको अच्छी नॉलेज हो और जिसमें आपको कुछ ना कुछ एक्सपीरियंस हो आप जो काम करना चाहते हैं ।उस से रिलेटेड आपके पास कोई नॉलेज या एक्सपीरियंस ना हो तो पहले उस काम की नॉलेज हासिल करें ऐसे लोगों से सीखे जो उसका महफिल में सक्सेसफुल है। बिना सोचे समझे किसी को देख कर कोई काम शुरु ना करें वरना आप उस काम में कभी भी सफल नहीं हो पाएंगे ।वहीं दूसरी और आपका इन्वेस्टमेंट टाइम तो बर्बाद होगा ही साथ ही साथ आपको अपने घर वालों दोस्तों और रिश्तेदारों के क्रिटिसिज्म का भी सामना करना पड़ेगा। इससे भी बुरी चीज यह हो सकती है कि इन सब चीजों के डर के कारण आप फिर कभी कोई नया काम शुरू ही ना करें। इन लोगों को नींद और भय क्रोध आलस्य तकदीर से काम करने की आदत इन 6 बुरी आदतों को हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए ।दुनिया में हर इंसान सक्सेसफुल होना चाहता है ,अमीर बनना चाहता है ,लेकिन ज्यादातर लोग अपनी किसी ना किसी बुरी आदत की वजह से गरीबी और बेरोजगारी के दलदल में फंसे रहते हैं ।यहां ऐसी ही 6 बुरी आदतों के बारे में बताया है ।जो हमें सक्सेसफुल और अमीर बनने से रोकते हैं ।जरूरत से ज्यादा नींद बोरियत गुस्सा वाला स्टेशन यानी कि किसी भी काम को देर से करने या टालमटोल करने की आदत अगर आप जरूरत से ज्यादा नींद से प्रेम करते हैं ।तो आपके सारे काम छूट जाएंगे और अगर सक्सेस से प्रेम करते हैं तो जरूरत से ज्यादा नींद और आलस को अपना दुश्मन बनाना ही पड़ेगा साथ ही साथ देरी से काम करने और हर जगह देर से पहुंचने के कारण मिलने वाली सफलता भी हाथों से निकल जा ती है। जैसे कि अगर आप किसी नौकरी के इंटरव्यू में देर से पहुंचते हैं तो क्या पता आप की देरी के कारण वह नौकरी किसी और को मिल जाए ।दूसरी तरफ टेनशन और गुस्सा इंसान की असफलता के सबसे प्रमुख कारण है। डर के कई रूप होते हैं जैसे चीजों के खोने का डर यही डर आपके अंदर घुसे और टेनश को भी जन्म देता है। विदुर नीति के अनुसार अगर आप अपनी इन छह बुरी आदतों को छोड़ देते हैं। तो आप भी सक्सेसफुल बन सकते हैं।   उसका तो कभी विश्वास किया ही नहीं जाना चाहिए पर जो विश्वास के योग्य नही है उस पर भी अधिक विश्वास नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि जब विश्वास टूटता है ।तो बहुत पीड़ा होती है दूसरों पर विश्वास करना एक बहुत ही इंपॉर्टेंट ह्यूमन नेचर है ।विश्वास ही हर रिश्ते की नींव होती है ,चाहे वह पर्सनल हो या फिर प्रोफेशनल जैसे कि जब आप किसी को पैसे देते हैं, या किसी से पैसे लेते हैं, या बाजार से किसी ब्रैंड का कोई सामान खरीदे हैं। या बीमार पड़ने पर किसी डॉक्टर के पास इलाज के लिए जाते हैं। तो विश्वास हर जगह काम करता है लेकिन मान लीजिए अगर आप किसी को पैसे उधार दे ,और वह वापस ना लौट आए तो क्या आप उसे फिर कभी उधार देने की बात सोच सकते हैं। या अगर आप किसी ब्रैंड का सामान खरीदें और वह घटिया क्वालिटी का निकले तो क्या आप फिर कभी उसका सामान खरीदेंगे ?शायद बिल्कुल नहीं, यही बात हमें विदुर नीति की इस नियम से पता चलती है कि कभी भी दूसरों पर आंख बंद करके विश्वास नहीं करना चाहिए। खासकर ऐसे लोग जो बिल्कुल भी भरोसे के लायक ना हो बल्कि वह यहां तक कहते हैं। कि अगर कोई व्यक्ति भरोसे के लायक हो तब भी उस पर हद से ज्यादा ट्रस्ट नहीं करना चाहिए ।क्योंकि अगर आप किसी पर जरूरत से ज्यादा ट्रस्ट करते हैं और आगे चलकर कभी आपका ट्रस्ट तोड़ता है तो आप इस चीज को  कर पाएंगे औ कभी आपका ट्रस्ट तोड़ता है तो आप इस चीज को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे । आपको बहुत दुख

Wednesday, 18 December 2019

गुरुद्वारा शिष्य को दिया ज्ञान

 एक गुरु ने अपने एक शिष्य को भगवान शिव की महिमा के बारे में बताया। शिष्य को समझाया विधि पूर्वक कैसे भगवान शिव की आराधना करनी है ।शिष्य ने गुरु से प्रश्न किया क्या सच में हमें भगवान शिव की आराधना से भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है। गुरु ने कहा बिल्कुल हमें भगवान शिव की आराधना से भगवान शिव का आशीर्वाद मिलता है। शिष्य को गुरु की बात पर विश्वास तो नहीं हुआ, परंतु शिष्य ने हर रोज भगवान शिव की आराधना शुरू कर दी।
शिष्य हर रोज भगवान शिव की पूजा करता और शिवलिंग को जल चढ़ा था। वह हर रोज ओम नमः शिवाय का जाप भी करता। वह अपनी तरफ से भगवान शिव को भक्ति से विवश कर रहा था। कि वह उसके सामने प्रकट हो और उसको आशीर्वाद दें ,कुछ दिनों तक तो ऐसे ही चलता रहा परंतु, कुछ दिनों बाद उसको लगा शिवजी नहीं आने वाले और ना ही उनकी पूजा का कोई लाभ उसको मिलने वाला है । बकोई आशीर्वाद नहीं मिलने वाला उसे भगवान शिव पर ही क्रोध आने लगा ,यह सत्य भी है ।श्रीमद भगवत गीता के दूसरे अध्याय  में श्रीकृष्ण बताते हैं इच्छा पूरी ना होने पर क्रोध का जन्म होता है। और यही हुआ शिष्य की इच्छा पूरी नही हुई तो क्रोध का जन्म हुआ, और क्रोध में उसकी बुद्धि भी मारी गई ,उस प्राणी ने यह सोचा भगवान शिव को मजा चख आएगा। वह भगवान शिव को सबक सिखाएगा ।ऐसा करने के लिए भगवान विष्णु की मूर्ति लेकर आया ।
उसने भगवान विष्णु की मूर्ति को भगवान शिव की मूर्ति के ठीक सामने रख दिया। अब उसने भगवान विष्णु की आराधना आरंभ कर दी और यह सब भगवान शिव को मनाने के लिए उसने विष्णु भगवान से कहना शुरू कर दिया ।हे विष्णु जी तुम ही परम परमात्मा हो शिव भगवान नहीं है ।तुम ही सत्य हो और अब जाकर में सच्चे परमात्मा की शरण में आया हूं। अब तक तो मैं गलत भगवान को ही पूजता रहा ।और मैं जानता हूं आप ही मुझे आशीर्वाद देंगे, अब कुछ दिन तक ऐसा करने से तो ,भगवान विष्णु का आशीर्वाद मिला और ना ही भगवान शिव का अब इच्छा पूरी नहीं हुई और क्रोध और गहरा हो गया ।और इस व्यक्ति की बुद्धि पर बेली का पर्दा और बढ़ गया ।और इस तुच्छ प्राणी नहीं कुछ अगरबत्तियां भगवान विष्णु के आगे चलाएं अगरबत्ती का धुआं फैलना स्वाभाविक था। और वह तो भगवान शिव की मूरत के आगे जाना भी स्वाभाविक था। यह बात इस व्यक्ति को जरा हजम नहीं हुई उसका क्रोध और बढ़ गया। उसने क्या किया अपनी मूर्खता दिखाते हुए भगवान शिव की मूरत की नाक पर ही हाथ रख दिया। और मुरैना को जोर लगाकर खींचने लगा और कहने लगा, शिव असली भगवान के लिए है ।और वह भगवान विष्णु है। ना कि भगवान शिव खबरदार जो तुमने मेरी जुलाई अगरबत्ती की खुशबू को अपनी नाक से महसूस किया ,उसने भगवान शिव की प्रतिमा को
जोर से पकड़ा था, ताकि भगवान शिव इसे ना महसूस कर सकें ,ओर इतनी जोर से दबा रहा था, कि उसकी आंखें बंद होगयी ।कुछ ही समय बाद इस व्यक्ति ने महसूस किया उसने सच की नाक पकड़ी हुई है। ना तो पत्थर की बनी,आंखें खोली तो स्वयं भगवान शिव को अपने सामने पाया ।भगवान शिव को अपने सामने देखकर इस व्यक्ति के पांव के नीचे से जमीन खिसक गई ।उसको कुछ समझ नहीं आया, क्या हो गया है पर एक बात जरूर हुई ,उसको अपनी गलती का एहसास हुआ ।उसको समझ आ गया उसने बहुत बड़ी गलती की है ।भगवान शिव का अपमान करके उसने ज्यादा समय ना गवाया और भगवान शिव के चरणों में पढ़कर  भीख मांगने लगा। और कहने लगा मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई है क्षमा करो महादेव । अपनी गलती का पश्चाताप करके माफी मांगी।

Friday, 15 November 2019

                    ,💐एक घड़ी का सत्संग💐,

          आध्यात्मिक ज्ञान पर आधारित स्टोरी, एक घड़ी का सत्संग कबीर साहब कहते हैं। कि एक घड़ी का सत्संग इतना अनमोल हैं कि आपको  डोली में  बिठाकर  स्वर्ग तक पहूंचा  सकता है ।इसे समझने के लिए  पूरी कहानी जरूर पढे। कबीर साहब ने बलक बुखारा के बादशाह से कहा भाई मैं आपके काम कर दूंगा परंतु आप एक घड़ी मेरा सत्संग सुन लीजिए। कबीर साहब ने बादशाह का काम करते हुए 1 घंटे तक सत्संग सुनाते रहे । सत्संग समाप्त होने पर कबीर  साहिब ने बादशाह से कहा कि जब आपसे सत्संग के विषय में पूछा जाएगा तो आपने एक घड़ी की सत्संग के फल की ईच्छा कहना। कुछ समय  पश्चात जब बादशाह का अंत समय आया। और वह मृत्यु  उपरांत बादशाह  धर्मराज के दरबार में  अपने पाप पुण्य का लेखा जोखा  देने पहुंचा। जब यमराज ने कहा  !इस पापी आत्मा ने  भगवान की भक्ति या सत्संग नहीं किया है  इसे कठिन सजा दी जाए  तब उस बादशाह ने कहा!  मैंने एक घड़ी सत्संग सुनना है । आप मुझे एक घड़ी के सत्संग का फल बताइए।

Monday, 9 September 2019

🌹 क्रिकेट मैच ( एक हास्य व्यंग) 🌹

           🌹 क्रिकेट मैच ( एक  हास्य व्यंग) 🌹

कुछ समय पहले की बात है। हिंदुस्तान और पाकिस्तान का  क्रिकेट मैच होने वाला था। इत्तेफाक से मेरी भी शादी की तारीख निकलने वाली थी। संयोग ऐसा बना कि मेरी शादी की तारीख और हिंदुस्तान और पाकिस्तान का फाइनल क्रिकेट मैच की तारीख एक ही घोषित हुई।
जीस समय मैं क्रिकेट मैच शुरू होने वाला था ।उसी समय मेरी बारात निकलने वाली थी। जैसे ही पाकिस्तान ताश जीता ,और खेलना शुरू किया।ठीक इसी के साथ, मोबाइल पर क्रिकेट मेज देखते हुए मेरी बारात का जुलूस भी आगे की ओर निकला जैसे- तैसे पाकिस्तान की बैटिंग समाप्त हुई और मेरी बारात पहुंची।
अब हिंदुस्तान की बैटिंग शुरू होने वाली थी। और मैं मंडप में जाने के लिए घोड़े पर सवार होने वाला था। जैसे ही मैं घोड़े पर सवार हुआ सभी मेरे दोस्त मोबाइल पर मैच देखते हुए चिल्ला पड़े ।और मेरी तरफ इशारा करके कहने लगे ,अबे छक्का---------------
जैसे तैसे मैंने अपने दोस्तों को समझाया भाई यह शादी है ।और मैं घोड़ी पर सवार हूं ।यहां सभी के सामने आप मुझे छक्का ना कहें । तब मेरे दोस्त ने मुझसे कहा  हिंदुस्तान ने छक्का मारा है।इस प्रकार में समझाई दिया जैसे तैसे जुलूस आगे बढ़ता गया सभी बाजे और मेरे दोस्त नाचने वालों की नजर क्रिकेट मैच की ओर टकटकी लगाए देख रहे थे ।इसी बीच करीब 11:00 बजे हिंदुस्तान क्रिकेट मेंज जीत गई ,और पाकिस्तान हार गई उन लोगों में खुशी का ठिकाना नहीं था ।
ईस खुशी में किसी ने मेरी घोड़ी की नीचे पटाखे फोड़ दिए और चिल्लाने लगे पाकिस्तान हार गई, हिंदुस्तान जीत गई हिंदुस्तान जीत गई फिर क्या था ।
मेरी घोड़ी बिचक गई ओ बाराती कहीं और मैं घोड़ी के साथ कहीं ,इसी प्रकार घोड़ी भागती गई ।मैं उसके साथ भागता गया घोड़ी भागती गई मैं उसके साथ भागता गया। इसी बीच मुझे ससुराल से फोन आया। दामाद कहां हो आप कहां हो ।मैंने कहा मैं भाग रहा हूं। उसने कहा आप कहां भाग रहे हो, मंडप में दुल्हन इंतजार कर रही है ।मैंने कहा मैं घोड़ी के साथ भाग रहा हूं तब ससुर जी ने कहा  यहां मंडप में आने के पहले  तुझे घोड़ी पसंद आई । जैसे तैसे मेरे दोस्तों का क्रिकेट नशा उतरा और उन्होंने मुझेे ढूंढना शुरू किया। बारात है बाजे बज रहे हैं परंतुु दूल्हा घोड़ी शहीत गायब है कहां गया उसे  ढूंढना चाहिए। जैसे तैसे मेरे दोस्तों ने मुझे और मेरे घोड़ी को संभाल कर लाया। और शादी लगा कर दुल्हन के हवाले मंडप में किया। जब तक सब के 12:00 बज चुके थे। इस प्रकार क्रिकेट मैच एक हास्य व्यंग के रूप में प्रस्तुत किया गया है ।और अधिक पढ़ने के लिए ब्लॉग उल्लेख ज्ञान सागर पढ़ते रहिए।

Tuesday, 27 August 2019

आयुर्वेद में गांजर के चमत्कार

              गाजर खाने से होने वाले फायदे  

  •              गाजर खाने से क्या क्या फायदे होते हैं । गाजर खाना चाहिए ।गाजर खाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है। गाजर खाने की निम्न फायदे नीचे दर्शाए जा रहे हैं।
  •       1   आधा सिर दर्द होने पर :-  आधा सिर दर्द होने पर गांजर के पत्ते का पानी गर्म करके नाक और कान में डालें।
  •      2   पथरी होने पर :- गाजर के बीज और शलजम के बीज 20 -20 ग्राम ले और मूली को अंदर से खोखला कर के गर्म राख में भुरते की तरफ भून ले। जब भून जाए तो बीज निकालकर पीस लें।6 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ एक महीना खाए बंद पेशाब खुलेगी और पथरी टूटकर निकल जाएगी।
  •       3   माहवारी के लिए  : - गाजर के बीज 30 ग्राम कूटकर 500 ग्राम पानी में उबाले ,जब पानी आधा रह जाए तो थोड़ी शक्कर डालकर दो-तीन दिन पिलाए, महावारी खुलकर आती है।
  •        4  जिगर की गर्मी :- गांजर 100 ग्राम ,गुड100 ग्राम, तीन पाव पानी में रात को आग पर पका ले । जब गाजर गल जाए तो सुबह चांदी के दो वर्क लगाकर खाए । जिगर की गर्मी और पीलिया को फायदा होगा। दस दिन खाए दिल को ताकत देती है।
            5   ताकत के लिए :- 1 किलो गांजर कद्दूकस में घिस लें।फीर 4 किलो दूध में पका ले ।चीनी आधा किलो डाल जब दूध सूख जाए तो एक बार देसी घी और 5 अंडे डालकर भूल ले । रोजाना 60 ग्राम खाकर ऊपर से दूध पी ले। एक महीना खाए। मर्दाना ताकत के लिए बढ़िया चीज है ।दिमाग भी ताकत देता है।
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